सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति में भूगोल की भूमिका: एक समकालीन विश्लेषण
Author(s): प्रो. (डॉ.) मीनाक्षी लोहनी
Abstract
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सतत विकास (Sustainable Development) मानव सभ्यता की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। तीव्र जनसंख्या वृद्धि, संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता ह्रास, खाद्य असुरक्षा, नगरीकरण तथा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं जैसी समस्याओं ने विकास की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती दी है। इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2015 में 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को स्वीकार किया, जिनका उद्देश्य वर्ष 2030 तक समावेशी, न्यायपूर्ण, पर्यावरण-संतुलित तथा समृद्ध विश्व व्यवस्था की स्थापना करना है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु बहु-विषयक दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें भूगोल का विशिष्ट स्थान है। भूगोल मानव और प्रकृति के परस्पर संबंधों, संसाधनों के स्थानिक वितरण, क्षेत्रीय असमानताओं, पर्यावरणीय परिवर्तनों तथा विकास की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। भूगोल का स्थानिक दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक क्षेत्र की समस्याएँ, संसाधन, आवश्यकताएँ और समाधान भिन्न होते हैं। अतः SDGs के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भूगोल एक सैद्धांतिक, विश्लेषणात्मक तथा व्यावहारिक उपकरण के रूप में कार्य करता है। प्रस्तुत शोधपत्र में सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भूगोल की भूमिका का समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया गया है। साथ ही भू-स्थानिक तकनीकों (GIS, Remote Sensing, GPS), भारत के संदर्भ में इसकी उपयोगिता, प्रमुख चुनौतियों तथा संभावनाओं का भी समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
मुख्य शब्द: सतत विकास, SDGs, भूगोल, पर्यावरण, GIS, जलवायु परिवर्तन, क्षेत्रीय नियोजन.
Cite this Article:
मीनाक्षी लोहनी. (2026). सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति में भूगोल की भूमिका: एक समकालीन विश्लेषण. Chaitanya Samvad Interdisciplinary Journal of Research, 2(1), 1–8.
Doi: https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i1.1
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