कृत्रिम बुद्धिमत्ता : असीम संभावनाओं के बीच नैतिकता का प्रश्न
Author(s): डॉ० दीपमाला
Abstract
इक्कीसवीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मानव सभ्यता के लिए एक ऐसी युगांतरकारी क्रांति बनकर उभरी है जिसने विज्ञान-कथाओं को यथार्थ में बदल दिया है। प्रस्तुत शोध पत्र में एलन ट्यूरिंग के प्रारंभिक सिद्धांतों से लेकर वर्तमान मशीन लर्निंग और बिग डेटा तक की एआई की विकास यात्रा और समाज पर इसके प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योग में एआई ने मानव क्षमताओं का अद्भुत विस्तार किया है, वहीं इसके अनियंत्रित विस्तार ने डीपफेक, निजता के हनन और पूर्वाग्रह जैसी गंभीर नैतिक चुनौतियां भी उत्पन्न की हैं। शोध का निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि मशीनें डेटा का विश्लेषण तो कर सकती हैं, किंतु संवेदना और विवेक केवल मनुष्य के पास है। अतः भविष्य में ‘रिस्पांसिबल एआई’ की आवश्यकता है, जहाँ तकनीक का संचालन पूर्णतः मानवीय मूल्यों और नैतिकता के अधीन हो, ताकि यह मानवता के लिए संकट न बनकर एक सशक्त सहयोगी सिद्ध हो सके।
बीज शब्द : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एथिक्स, सॉफ्टवेयर, मानवता, रिस्पांसिबल।
Cite this Article:
दीपमाला. (2025). कृत्रिम बुद्धिमत्ता : असीम संभावनाओं के बीच नैतिकता का प्रश्न. Chaitanya Samvad Interdisciplinary Journal of Research, 1(3), 39-43.
Doi: https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v1i3.5
Journal URL: https://chaitanyasamvad.com/
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