हिंदी साहित्य की कहानियों में स्त्री-प्रतिरोध का मुखर स्वर
Author(s): आराधना वर्मा
Abstract
हिंदी कहानी साहित्य में स्त्री-प्रतिरोध एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विमर्श के रूप में उभरकर सामने आया है। यह प्रतिरोध केवल बाह्य सामाजिक संरचनाओं, रूढ़ियों और दमनकारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष भर नहीं है, बल्कि स्त्री की आत्मचेतना, अस्मिता, गरिमा तथा स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना का सशक्त माध्यम भी है। लंबे समय तक साहित्य और समाज में स्त्री को त्याग, सहनशीलता और मौन स्वीकृति के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा, किंतु आधुनिक समय में यह छवि बदलती दिखाई देती है। प्रारंभिक साहित्य में स्त्री का प्रतिरोध प्रायः मौन, सांकेतिक और आंतरिक रूप में व्यक्त हुआ, जहाँ वह प्रत्यक्ष विद्रोह न करके अपनी चुप्पी, संवेदना और मानसिक असहमति के माध्यम से विरोध दर्ज कराती है। इसके विपरीत समकालीन कथा-साहित्य में यह स्वर अधिक मुखर, वैचारिक और सक्रिय रूप ग्रहण करता है, जहाँ स्त्री अपने अधिकारों, समानता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता के लिए खुलकर संघर्ष करती है (सिंह, 2010)। प्रस्तुत अध्ययन में स्त्री-प्रतिरोध की अवधारणा, उसके विविध स्वरूपों तथा हिंदी कहानियों में उसके साहित्यिक विकास का विश्लेषण किया गया है। साथ ही पितृसत्ता, लैंगिक असमानता और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में नई पीढ़ी की लेखिकाओं द्वारा प्रस्तुत प्रतिरोध के नए आयामों को रेखांकित किया गया है। निष्कर्षतः हिंदी कहानियों में स्त्री-प्रतिरोध केवल साहित्यिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सशक्त चेतना है।
कुंजी शब्द: स्त्री-प्रतिरोध, हिंदी कहानी, पितृसत्ता, स्त्री-अस्मिता, समकालीन साहित्य
Cite this Article:
आराधना वर्मा. (2026). हिंदी साहित्य की कहानियों में स्त्री-प्रतिरोध का मुखर स्वर. Chaitanya Samvad Interdisciplinary Journal of Research, 2(1), 34–43.
Doi: https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i1.5
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