यूरोपीय और भारतीय नवजागरण
DOI:
https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i3.5Abstract
यह आलेख यूरोपीय और भारतीय नवजागरण की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं, वैचारिक आधारों तथा सामाजिक प्रभावों का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है। यूरोप में मध्यकालीन सामंतवाद, चर्च-नियंत्रित ज्ञान व्यवस्था और कुस्तुनतुनियाँ के पतन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों ने पुनर्जागरण की भूमि तैयार की। इटली, विशेषतः फ्लोरेंस, में दांते, पेत्रार्का और वोकैचियो के साहित्यिक योगदान, प्राचीन ग्रीक-रोमन ग्रंथों की पुनर्खोज, मुद्रण तथा मानवतावादी चेतना ने मनुष्य को विचार और सृजन के केंद्र में स्थापित किया। आलेख यह भी रेखांकित करता है कि भारतीय नवजागरण को केवल उन्नीसवीं सदी तक सीमित करना उचित नहीं है। आलवार-नयनार परंपरा, सिद्धों, नाथों, रामानुजाचार्य, रामानंद, कबीर तथा अन्य संतों की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना ने जाति-भेद, पुरोहितवाद और रूढ़ियों के विरुद्ध जनपक्षधर आवाज विकसित की। भक्ति आंदोलन ने लोकभाषा, समानता और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित किया, यद्यपि सामंती संरचनाओं तथा सांप्रदायिक संस्थानीकरण ने इसकी सीमाएँ भी निर्मित कीं। आगे, राजा राममोहन राय, विद्यासागर, दयानंद, सर सैयद, विवेकानंद, फुले, पंतुलु, नारायण गुरु और गांधी जैसे चिंतकों के माध्यम से आधुनिक भारतीय नवजागरण के बहुआयामी स्वरूप को समझाया गया है। निष्कर्षतः लेख नवजागरण को केवल साहित्यिक या राजनीतिक घटना न मानकर सामाजिक न्याय, स्त्री-मुक्ति, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टि और मानवतावाद से संबद्ध दीर्घकालिक जनचेतना के रूप में देखता है। तुलना का आधार यह है कि दोनों परंपराओं में ज्ञान के अधिकार, सामाजिक सहभागिता और स्थापित सत्ता-संरचनाओं की आलोचना को महत्त्व मिला। इस प्रकार अध्ययन समानताओं के साथ-साथ यूरोपीय अनुभव की नगर-केंद्रित गति और भारतीय अनुभव की लोकधर्मी, दीर्घकालिक तथा विविधतापूर्ण प्रकृति को भी सामने लाता है। यह विवेचन नवजागरण की तुलनात्मक समझ को अधिक स्पष्ट और समग्र बनाता है।
मुख्य शब्द: यूरोपीय नवजागरण, भारतीय नवजागरण, मानवतावाद, भक्ति आंदोलन, सामाजिक सुधार, जाति-विमर्श, स्त्री-मुक्ति, लोकभाषा, आधुनिकता, गांधी