जॉन ड्यूई के शिक्षा-दर्शन में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं स्वतंत्र चिंतन की अवधारणा: समकालीन शिक्षा के संदर्भ में प्रासंगिकता और चुनौतियों का अध्ययन

Authors

  • डॉ. मोहम्मद काशिफ तौफ़ीक असिस्टेंट प्रोफेसर (टीचर एजुकेशन),चौ० चरण सिंह पी० जी० कॉलेज हेंवरा, इटावा, उत्तर प्रदेश Author
  • अजय शंकर असिस्टेंट प्रोफेसर (टीचर एजुकेशन), गंजडुंडवारा पी. जी. कॉलेज गंजडुंडवारा कासगंज, उत्तर प्रदेश Author

DOI:

https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i3.6

Abstract

जॉन ड्यूई का शिक्षा-दर्शन आधुनिक शैक्षिक चिंतन में ऐसी महत्वपूर्ण वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया न मानकर व्यक्ति और समाज के निरंतर विकास का माध्यम माना गया है। ड्यूई के अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना है जो अपने सामाजिक परिवेश को समझ सकें, उसके साथ सक्रिय रूप से जुड़ सकें तथा आवश्यकतानुसार उसमें सुधार के लिए योगदान दे सकें। इसी कारण उन्होंने शिक्षा और लोकतंत्र के बीच गहरे संबंध को स्वीकार किया। उनके विचार में लोकतंत्र केवल शासन की एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सहयोग, सहभागिता, संवाद, पारस्परिक सम्मान और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित जीवन-पद्धति है (Dewey, 1916)। ऐसी लोकतांत्रिक जीवन-पद्धति के विकास के लिए विद्यालय को समाज से अलग संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन के अभ्यास-स्थल के रूप में कार्य करना चाहिए।

ड्यूई के शिक्षा-दर्शन में स्वतंत्र चिंतन भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे विद्यार्थियों को पूर्वनिर्धारित विचारों को निष्क्रिय रूप से स्वीकार करने के बजाय अनुभवों, प्रश्नों और समस्याओं के आधार पर विचार करने तथा निष्कर्ष तक पहुँचने के अवसर देने के पक्षधर थे। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य ड्यूई की इन दोनों अवधारणाओं का विश्लेषण करते हुए समकालीन शिक्षा में उनकी प्रासंगिकता, संभावनाओं तथा व्यावहारिक चुनौतियों को समझना है।

मुख्य शब्द (Keywords) : शिक्षा-दर्शन; लोकतांत्रिक शिक्षा; लोकतांत्रिक मूल्य; स्वतंत्र चिंतन; अनुभवात्मक अधिगम; डिजिटल शिक्षा

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Published

2026-09-30

How to Cite

जॉन ड्यूई के शिक्षा-दर्शन में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं स्वतंत्र चिंतन की अवधारणा: समकालीन शिक्षा के संदर्भ में प्रासंगिकता और चुनौतियों का अध्ययन. (2026). Chaitanya Samvad Interdisciplinary Journal of Research, 2(3), 41-47. https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i3.6