भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य एवं भावनात्मक संतुलन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण समकालीन मनोविज्ञान के आलोक में एक व्याख्यात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.65250/chaitanyasamvad.v2i2.3Abstract
भगवद्गीता का आरम्भ किसी निर्विकार दार्शनिक जिज्ञासा से नहीं, बल्कि अर्जुन के तीव्र मनोदैहिक संकट से होता है। युद्धभूमि में उसका शरीर काँपता है, मुख सूखता है, मन भ्रमित होता है और कर्तव्य-निर्णय की क्षमता शिथिल पड़ जाती है। इस अर्थ में गीता मनुष्य की पीड़ा, संज्ञानात्मक द्वंद्व और नैतिक संकट के बीच संवाद द्वारा पुनर्संगठन की कथा भी है। प्रस्तुत आलेख गुणात्मक, पाठ-विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक पद्धति से गीता के प्रमुख मनोवैज्ञानिक सूत्रों—समत्व, निष्काम कर्म, आत्म-नियमन, इन्द्रिय-संयम, ध्यान, विवेक, स्वधर्म, भक्ति और त्रिगुण—का मानसिक स्वास्थ्य एवं भावनात्मक संतुलन के संदर्भ में विश्लेषण करता है। इन अवधारणाओं की तुलना संज्ञानात्मक पुनर्मूल्यांकन, मनोवैज्ञानिक लचीलापन, माइंडफुलनेस, स्व-प्रभावकारिता, मूल्य-आधारित कर्म और भाव-नियमन के आधुनिक सिद्धांतों से की गई है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि गीता भावनाओं के दमन की शिक्षा नहीं देती; वह भाव को पहचानकर, दृष्टिकोण बदलकर और फलासक्ति से मुक्त अर्थपूर्ण कर्म चुनकर भावनात्मक ऊर्जा को परिष्कृत करने का मार्ग प्रस्तुत करती है। साथ ही यह सावधानी आवश्यक है कि गीता-आधारित अंतर्दृष्टि को मानसिक रोगों की चिकित्सकीय देखभाल का विकल्प न माना जाए। सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील परामर्श, मूल्य-शिक्षा और निवारक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में इसका सहायक उपयोग अधिक उपयुक्त है।
मुख्य शब्द: भगवद्गीता, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन, समत्व, निष्काम कर्म, आत्म-नियमन, मनोवैज्ञानिक लचीलापन, भारतीय मनोविज्ञान।