समग्र शिक्षा की अवधारणा: स्वामी विवेकानन्द एवं महर्षि पतंजलि के शैक्षिक दर्शन का तुलनात्मक विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.65250/xq23jt02Keywords:
समग्र शिक्षा, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि पतंजलि, योग-दर्शन, चरित्र-निर्माण, अष्टांग योग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020Abstract
यह शोध-पत्र समग्र शिक्षा की भारतीय अवधारणा को स्वामी विवेकानन्द और महर्षि पतंजलि के विचारों के आलोक में समझने का प्रयास करता है। अध्ययन का आधार गुणात्मक, दार्शनिक तथा तुलनात्मक विश्लेषण है। प्राथमिक स्रोतों के रूप में विवेकानन्द के सम्पूर्ण वाङ्मय और पतंजलि के योगसूत्र तथा सहायक स्रोतों के रूप में शिक्षा-दर्शन, योग-मनोविज्ञान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से संबंधित साहित्य का उपयोग किया गया है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दोनों विचारक शिक्षा को सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित क्षमताओं के जागरण, आत्मनियंत्रण, चरित्र-निर्माण और उच्चतर चेतना की यात्रा के रूप में देखते हैं। विवेकानन्द का दृष्टिकोण ‘मनुष्य-निर्माण’, आत्मविश्वास, निर्भीकता, सेवा और सामाजिक उत्थान पर केंद्रित है, जबकि पतंजलि चित्तवृत्ति-निरोध, अभ्यास-वैराग्य और अष्टांग योग के माध्यम से व्यक्तित्व के क्रमिक परिष्कार की मनोवैज्ञानिक पद्धति प्रस्तुत करते हैं। दोनों में नैतिक अनुशासन, एकाग्रता, अनुभवात्मक ज्ञान और गुरु की भूमिका को महत्त्व प्राप्त है; फिर भी विवेकानन्द का दर्शन अधिक समाजोन्मुख और गतिशील वेदान्तपरक है, जबकि पतंजलि का लक्ष्य कैवल्य तथा द्रष्टा की स्वरूप-स्थिति है। शोध-पत्र का निष्कर्ष है कि समकालीन शिक्षा में दोनों दृष्टियों का विवेकपूर्ण समन्वय विद्यार्थियों के शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन, संज्ञानात्मक एकाग्रता, नैतिक विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व को एक साथ विकसित कर सकता है।